पितृ पक्ष और महालय अमावस्या — पूर्वजों से आशीर्वाद व क्षमा-याचना | गुरुदेव श्री अनीश
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सत्संग से — साधो ब्लॉग

पितृ पक्ष और महालय अमावस्या —
पूर्वजों से आशीर्वाद व क्षमा-याचना

पूर्वजों के ऋण से मुक्ति कैसे हो? धन्यवाद, क्षमा-याचना और क्षमा के तीन भावों से ऋण-मुक्त होकर शक्ति के नौ दिनों में प्रवेश करने का उत्तम समय।

9 min read गुरुदेव श्री अनीश सत्संग प्रश्नोत्तर
महालय अमावस्या यज्ञ में गुरुदेव श्री अनीश

प्रश्न

पितृ पक्ष और महालय अमावस्या का साधना में क्या महत्व है? क्या हमारी जीवन-यात्रा में हमारे पूर्वजों का कोई सार्थक योगदान होता है — और उनके ऋण से मुक्ति कैसे हो?

गुरुदेव श्री अनीश — महालय अमावस्या के सत्संग से

इस यात्रा में, जीवन की हर उपलब्धि में मेरे पूर्वजों का योगदान है। जैसा कि हम लोग जानते हैं, महालय अमावस्या का दिन बहुत ही अद्भुत दिन है, इस दिन की बहुत महिमा है। सोलह दिन का जो श्राद्ध का समय होता है, वह इस दिन समाप्त होता है, और इसी महालय अमावस्या से हम देवी-यज्ञ में प्रवेश करते हैं। नवरात्रि के दिनों में एक द्वार खुलता है, तो यह परिवर्तन का समय है।

महालय का, पितृ पक्ष का, इस अमावस्या का क्या महत्व है? जैसे-जैसे हम आधुनिक होते जा रहे हैं, हम बहुत सारे आध्यात्मिक विज्ञान को भूलते जा रहे हैं। मैंने शब्द इस्तेमाल किया ‘आध्यात्मिक विज्ञान’। यह विज्ञान है, यह सत्य है, इसके अनुभव लोगों के पास हैं। आज नहीं तो कल विज्ञान भी इसे प्रमाणित कर लेगा। थोड़ा इसे समझने का प्रयास करते हैं।

रात में भी सूर्य है

हम जैसे हैं, अकेले नहीं हैं। हम बहुत लोगों से, बहुत ऊर्जाओं से सतत जुड़े हुए हैं। कुछ लोगों को, कुछ चीज़ों को हम पाँच इन्द्रियों के तल पर समझ पाते हैं, लेकिन ऐसी बहुत सारी ऊर्जाएँ हैं जिनसे हम जुड़े रहते हैं और जिन्हें हम महसूस नहीं कर पाते।

इसे ऐसे समझो जैसे दिन में तुम सूर्य के दर्शन कर पाते हो, सूर्य का ताप महसूस कर पाते हो, उसकी रोशनी से पूरे जगत को देख पाते हो। लेकिन जब रात होती है, तो ऐसा नहीं है कि सूर्य समाप्त हो गया। सूर्य चला नहीं गया — सूर्य अभी भी इस ब्रह्मांड में है, बस तुम्हारी इन्द्रियों को उसकी अनुभूति होना बंद हो गई। सूर्य की उपस्थिति और ऊर्जा अभी भी है, वह सतत है। हाँ, प्रकाश के रूप में नहीं तो किसी अदृश्य रूप में सूर्य की ऊर्जा सतत हमें मिल रही है, चाहे दिन हो या रात, बादल हो या वर्षा — क्योंकि सूर्य सदा उपस्थित है। बस हमारी पाँचों इन्द्रियाँ रात के समय उसकी उपस्थिति को महसूस नहीं कर पातीं।

कहने का अर्थ यह हुआ कि इस ब्रह्मांड में बहुत सारी ऊर्जा है जिससे हम जुड़े हुए हैं, लेकिन जो पाँचों इन्द्रियों से परे है — यह पहली बात।

जीवन एक सतत धारा

दूसरी बात, जीवन का जो स्वरूप हमने सनातन परंपरा में जाना है, हमारे अनुभव भी यही कहते हैं — जीवन की शुरुआत जन्म से और अंत मृत्यु से नहीं होता।

जीवन एक सतत धारा है, निरंतर बहते रहना।

जन्म के साथ इन्द्रियों वाले हमारे अनुभव शुरू होते हैं, और मृत्यु के साथ पाँच इन्द्रियों से किए गए वे अनुभव समाप्त हो जाते हैं। लेकिन जीवन की जो धारा हमारे भीतर है, वह सतत चलती रहती है, रुकती नहीं। हाँ, जैसा हम सुनते-समझते आए हैं, जीवन अपना स्वरूप बदलता है — आज मैं इस स्वरूप में हूँ, आज जीवन इसी स्वरूप के माध्यम से मुझसे प्रकट हो रहा है। कल यही जीवन किसी अन्य स्वरूप के माध्यम से प्रकट होगा — सिर्फ़ स्वरूप बदलेगा, पर मैं जो हूँ, जो इस जीवन की सतत धारा में हूँ, मैं कल भी था, आज भी हूँ, कल भी रहूँगा; क्योंकि यही सतत धारा हमारा सत्य है — यह दूसरी बात।

अब मृत्यु के उपरांत होता क्या है? पंचभूत शरीर इस सृष्टि के पंचभूतों में मिल जाता है। लेकिन हमारा मन, यानी जिसे तुम बुद्धि या मन बोलते हो, उस पर बहुत सारे संस्कार जुड़े हुए हैं। पूरे जीवन में जैसे-जैसे मैंने जीवन को अनुभव किया, वे सब संस्कार मेरे मन पर अंकित होते जाते हैं, उनकी छाप मेरे मन पर पड़ती जाती है। और जिसे हम आत्म या आत्मा कहते हैं, जब वह मृत्यु के समय शरीर से निकलती है, तो ये अनुभव और संस्कार उसके साथ जुड़ जाते हैं।

शरीर का तो समापन हो जाता है, पर जिसे तुम आत्मा कहते हो — जिसके साथ मन और संस्कार जुड़ गए — जीवन की वह धारा निरंतर चलती रहती है, किसी लोक में, किसी अदृश्य लोक में, किसी अदृश्य वायुमंडल में। यह ऊर्जा सतत बनी रहती है, और फिर यही ऊर्जा किसी और स्वरूप को जन्म देकर वहाँ स्वयं को प्रकट करती है। इस तरह जीवन की धारा निरंतर चलती रहती है।

पूर्वजों के योगदान के ऋण से मुक्ति कैसे हो?

अब पितृ पक्ष — जो तुम हो, जो तुम्हारा शरीर है, जो तुम्हारा मन है, जो तुम्हारे ऊपर संस्कारों की छाप है, जिसे अनुकूलन या व्यावहारिकता में ढला हुआ भी कहते हैं — यह सिर्फ़ तुम्हारा अपना नहीं है। आज तुम जीवन की जिस अवस्था में हो, तुम्हारे पास जितना ज्ञान है, जितना स्वास्थ्य है, जो भी है — यहाँ तक कि तुम्हारा धन और तुम्हारी समृद्धि — यह तुमने स्वयं अर्जित नहीं किया। यह जीवन की उस सतत धारा से आया है जिससे तुम सभी ऊर्जाओं से जुड़े हो। यह तुम्हारे पूर्वजों से चला आ रहा है।

मैं अक्सर कहता हूँ, हम ऋषियों की परंपरा के वंशज हैं। भारत में किसी भी व्यक्ति का जो गोत्र होता है, वह इसी परंपरा का हिस्सा है — अगर तुम अपना गोत्र ढूँढोगे तो वह किसी न किसी सप्तर्षि में से किसी एक ऋषि के नाम का होगा। इसका अर्थ है कि हम उसी ऋषि की, उसी ऋषि-परंपरा की संतान हैं। और आज मेरे भीतर जो संस्कार हैं — इस शरीर में, इस बुद्धि में, इस हृदय में, इस यात्रा में — जीवन की हर उपलब्धि में मेरे पूर्वजों का योगदान है। मैं यहाँ अकेला नहीं हूँ जो इस जीवन को चला रहा हूँ; मेरे पूर्वजों का इसमें बहुत बड़ा योगदान है।

मगर पूर्वज तो देह छोड़कर जा चुके हैं। अब मैं इस योगदान के ऋण से मुक्त कैसे होऊँ? मैंने शब्द इस्तेमाल किया ‘ऋण’ — यह तुम्हारे ऊपर तुम्हारे पूर्वजों का एक कर्ज़ है। जब तक यह कर्ज़ चुकाया नहीं जाता, तब तक यह बोझ बना रहता है, और तब तक तुम पूर्ण मुक्ति का अनुभव नहीं करते। जीवन में सब कुछ होते हुए भी अनंत आनंद का अनुभव नहीं हो पाता, क्योंकि हमारे ऊपर कुछ ऋण हैं — किसके? हमारे पूर्वजों के।

कुछ वरदान, कुछ अभिशाप

यह ऋण दोनों तरह के होते हैं — सकारात्मक और नकारात्मक। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्होंने मेरे जीवन में कुछ ऐसा योगदान दिया जिससे मेरा जीवन आज फलित हो रहा है, खुशहाल हो रहा है, और मैं इस साधना के पथ पर चल रहा हूँ। साथ ही कुछ पूर्वजों ने मुझे कुछ दोष भी दिए हैं — मेरा अहंकार, मेरे भीतर उठने वाला क्रोध का भाव, हमारी कुछ त्रुटियाँ — ये त्रुटियाँ हमें हमारे पूर्वजों से भी मिली हैं। इन्हीं त्रुटियों को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ‘आनुवंशिक बीमारी’ कहता है।

तो दो चीज़ें मिलीं पूर्वजों से — कुछ वरदान, कुछ अभिशाप। वरदान के रूप में जिस तरह की शिक्षा तुमने ग्रहण की है, जीवन को देखने की तुम्हारी सुंदर दृष्टि, तुम्हारे हृदय में ईश्वर को जानने का, सत्य को पा लेने का जो प्रेम और प्यास है — यह मुझे ऋषियों से, अपने पूर्वजों से मिली है। और जो त्रुटियाँ हैं, वे भी पूर्वजों से मिली हैं, साथ ही उनमें मेरा भी योगदान है। यह जीवन बहुत जटिल है, ऐसा नहीं कहूँगा, पर एक मिला-जुला रंग ज़रूर है — कुछ मेरा है इसमें, कुछ पूर्वजों का, कुछ ऋषियों का, कुछ ईश्वर का।

पच्चीस प्रतिशत तुम्हारा योगदान, पच्चीस प्रतिशत तुम्हारे पूर्वजों का, पच्चीस प्रतिशत तुम्हारी ऋषि-परंपरा का, और पच्चीस प्रतिशत मानो ईश्वर का।

ये सब मिलकर तुम्हारे ‘मैं’ का स्वरूप बनाते हैं — इसमें तुम्हारे चार घटक हैं, तुम अकेले घटक नहीं हो। हाँ, ईश्वर में मैं गुरुओं को भी शामिल कर रहा हूँ। इस तरह से भी इसे देखा जा सकता है।

इन सोलह दिनों में

अब पितृ पक्ष में इन दिनों हो क्या रहा है? भारत में ऐसी मान्यता है कि इन सोलह दिनों में जो पितर अलग-अलग लोकों में हैं — कुछ ने शरीर धारण कर लिया है, और कुछ का, शरीर धारण करने के बाद भी, कुछ अंश किसी ईश्वरीय लोक में, किसी ऊर्जा-लोक में है — वे सभी पितर इन सोलह दिनों स्वयं को पृथ्वी-लोक पर लाते हैं, अपने पुराने और नए प्रियजनों से मिलने के लिए। मानो इन सोलह दिनों एक प्रवेश-द्वार खुलता है, जहाँ तुम अपने पितरों तक पहुँच सकते हो। शरीर रूप में नहीं, पर ऊर्जा रूप में, संस्कार रूप में, परंपरा के रूप में वे कहीं विद्यमान हैं — इन पाँच इन्द्रियों के दायरे से बाहर विद्यमान हैं — और इन सोलह दिनों वे उपलब्ध रहते हैं, उनका प्रवेश-द्वार खुला रहता है।

इसी के ऊपर हमने यह प्रथा बनाई, एक परंपरा गढ़ी — कि इन सोलह दिनों में आज का दिन सबसे शक्तिशाली और ऊर्जावान दिन है। आज का आधुनिक विज्ञान भी, आनुवंशिक सूचना यानी डीएनए के माध्यम से, यही बात कहता है। जो डीएनए तुम्हारे शरीर और मन का निर्माण करता है, उसका पता करने पर हज़ारों-लाखों साल का इतिहास निकाला जा सकता है — तुम्हारे पूरे पूर्वजों का इतिहास, क्योंकि उसका मूल सूत्र तुम्हारे डीएनए में समाया हुआ है। आधुनिक विज्ञान भी अब इसे कुछ हद तक समझने लगा है।

पितरों के लिए प्रसाद अर्पण
महालय अमावस्या पर पितरों के लिए प्रसाद अर्पण

धन्यवाद, क्षमा-याचना और क्षमा

इस दिन सबसे पहले मैं अपने सभी पितरों को, पूर्वजों को धन्यवाद दूँगा — जो जीवन में मिला उसका, उनके योगदान का, उनके आशीर्वाद से जो मिला उसका। इन दिनों जो कुछ भी अपने पूर्वजों से मिला, उसका हृदयपूर्वक धन्यवाद करूँगा। धन्यवाद करने मात्र से ही कुछ ऋण मुक्त हो जाता है, तुम कुछ हद तक स्वतंत्र और मुक्त हो जाते हो — यह पहला।

दूसरा, जाने-अनजाने इस जीवन में और पिछले जन्मों में पितरों के साथ जो कुछ ग़लत हुआ — कुछ अपशब्द, कुछ मनमुटाव, कुछ दुःख — उसके लिए आज उनसे क्षमा माँग लेता हूँ, और क्षमा माँगने से भी कुछ ऋण मुक्त हो जाएगा।

तीसरा, उनके माध्यम से मुझे जो त्रुटियाँ मिली हैं — कुछ रोष या क्रोध जो मैंने अपने किसी पूर्वज के, किसी स्वर्गवासी माता-पिता या नाना-नानी के प्रति पकड़ रखा है, क्योंकि उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसके कारण मैं उन्हें माफ़ नहीं कर पाया — कई साथियों का भी ऐसा अनुभव है, और वह एक दुःख की डोर पितरों के साथ जुड़ी रह जाती है। आज के दिन मैं भी उन्हें क्षमा करता हूँ — जो अच्छा मिला उसका धन्यवाद, जो दुःख मैंने उन्हें पहुँचाया उसके लिए क्षमा, और उनकी जो त्रुटियाँ मुझे मिलीं उन्हें भी मैं माफ़ करता हूँ। इन तीनों क्षमा-याचनाओं से मैं उनके प्रति पूर्णतः मुक्त हो जाऊँगा — इस जीवन में पितरों के सभी ऋणों से मुक्त हो जाऊँगा।

साधना की दृष्टि से — मुक्ति

साधना की दृष्टि से इसे कैसे देखें — साधना में हम किस ओर बढ़ रहे हैं? मुक्ति की ओर। मुक्ति का क्या अर्थ है? मैं अपने सभी ऋणों से मुक्त हो जाना चाहता हूँ। यह ऋण कहाँ है? यह मेरी बुद्धि में, मेरे मस्तिष्क में भरा हुआ है — मेरे स्वरूप पर भार बनकर, त्रुटियों के रूप में, जो मेरे मन को बोझिल करता है। मुझे इससे मुक्त होना है। अपने मन से मुक्त होने के लिए मुझे पितरों से भी मुक्त होना पड़ेगा, क्योंकि पितरों का भी एक बड़ा योगदान मेरे मन का हिस्सा है।

कैसे होऊँगा मुक्त? क्या केवल किसी साधना-पद्धति से मुक्त हो जाऊँगा? हाँ, उससे कुछ मुक्ति मिलेगी, लेकिन जो यह अदृश्य ऋण चल रहा है, इससे भी मुक्त होना है। प्रार्थना और भीतर का भाव, हृदय का भाव, बहुत शक्तिशाली है।

हृदय का भाव हिमालय पर्वत को भी बदल सकता है, तुम्हारी प्रार्थना इस सृष्टि को भी बदल सकती है।

इतना बल हृदय के भाव और प्रार्थना में है। हृदय के इसी भाव के बल से, अपनी प्रार्थना के बल से, आज मैं यह संदेश अपने पितरों तक पहुँचा सकता हूँ और इस ऋण से मुक्त हो सकता हूँ।

और जैसे ही मैं अपने पितरों के ऋण से मुक्त होता हूँ, उनके योगदान को हृदय के गहरे तल पर तहे दिल से अनुभव करता हूँ, यात्रा में एक सौंदर्य आने लगता है, एक हल्कापन आने लगता है, और पितरों तथा ऋषियों का भरपूर आशीर्वाद मिलने लगता है — क्योंकि उन्हें दिखता है कि तुम सतत भाव की अवस्था से उन्हें महसूस कर रहे हो, उनसे बात कर रहे हो, अपनी ग़लतियों की क्षमा माँग रहे हो। तुम आज उन्हें सारे बंधनों से मुक्त कर रहे हो, और साथ ही स्वयं भी उन सभी बंधनों से — डीएनए सहित — मुक्त होते हो, क्योंकि तुम्हारे भीतर की सत्ता तो ईश्वरीय है। तो मेरे डीएनए के स्वरूप में, मेरे मन के स्वरूप में जो भी बाहरी बंधन हैं, आज पितृ पक्ष में इस प्रार्थना से मैं उन सभी बंधनों से मुक्त होता हूँ।

पितरों को समर्पित प्रसाद
श्रद्धा और कृतज्ञता से अर्पित प्रसाद

ऋण से शक्ति की ओर

यही है पितृ पक्ष और महालय का महत्व — यह अत्यंत शक्तिशाली और अद्भुत समय है। देखो, ऋषियों ने यह परंपरा बनाई कि जिस दिन अमावस्या की रात को पितृ पक्ष का समापन होता है, उसी समय माँ आदि शक्ति के दिनों की शुरुआत हो जाती है — कि यहाँ तुम ऋण-मुक्त हुए, और वहाँ से शक्ति में, बल में प्रवेश करो। ये नौ दिन बल के, शक्ति के दिन हैं। तो पहले इस ऋण से मुक्त हो, अपने भूतकाल के सभी बंधनों से मुक्त हो जाओ।

यह बात ध्यान से सुनो —

तुम्हारे सारे बंधन वर्तमान के नहीं हैं। तुम्हारे सारे बंधन, तुम्हारे सारे भार, तुम्हारे सारे रोग भूतकाल के हैं, पीछे के हैं।

आज जिन चीज़ों को लेकर तुम चिंतित होते हो, उनके बीज भूतकाल में हैं — तुम भूतकाल के कुछ अनुभवों से अपने भविष्य की कल्पना करते हो और चिंतित हो जाते हो। जब तक तुम गुज़री हुई बातों से मुक्त नहीं होगे, तब तक वर्तमान में जीना नहीं सीख पाओगे, और अगर वर्तमान में जीना नहीं सीखोगे तो एक आनंदित भविष्य का निर्माण भी नहीं कर पाओगे।

तो यहाँ से मुक्ति चाहिए। पितृ पक्ष गुज़रा हुआ समय है — वहाँ से मुक्त होकर आज यह परिवर्तन का दिन है, और अगली सुबह से मैं फिर शक्ति में प्रवेश करूँगा, फिर माँ को पुकारूँगा — उनके मार्गदर्शन, उनकी शक्ति, उनकी करुणा और प्रेम के लिए, जो जीवन में और साधना में आगे गहरे उतरने के लिए चाहिए। यही प्रक्रिया है। तो यह है पितृ पक्ष का महत्व — विशेषकर साधक के लिए। साधक की यही दृष्टि होनी चाहिए — मुक्ति की दृष्टि, बोझ और ऋण से मुक्ति की दृष्टि।

ध्यान-अभ्यास: पूर्वजों का स्मरण, धन्यवाद और क्षमा-याचना

एक मिनट के लिए अपनी आँखें बंद करें — जहाँ हो, जहाँ बैठे हो, बस एक क्षण के लिए आँखें बंद करो।

याद करो अपने उन पूर्वजों को जिन्हें इस जीवन में तुम्हें मिलने का सौभाग्य मिला — जो आज शरीर छोड़कर जा चुके हैं, पर तुम उनसे मिले हो। स्मरण करो अपने उन पूर्वजों का भी जिनका तुमने केवल नाम सुना है — बचपन में, जवानी में। स्मरण करो, और पीछे जाओ — अपने उन पूर्वजों का भी स्मरण करो जिनका तुमने नाम भी नहीं सुना, पर तुम उनके वंशज हो — दादा, परदादा, दादी, परदादी और अपने परिवार के उस पूरे वृक्ष के सभी पूर्वजों का, जिसकी तुम एक डाली हो, जिनसे तुम ऊर्जा के रूप में, डीएनए के रूप में जुड़े हो। स्मरण करो उस ऋषि-परंपरा का जिसके तुम वंशज हो। स्मरण करो अपने परमपिता ईश्वर का, चाहे जिस रूप में तुम उन्हें मानते हो, और परम माँ आदि शक्ति का, जिस रूप में भी तुम उन्हें देखते हो।

स्मरण करो, और अब हृदयपूर्वक उन सभी पूर्वजों को धन्यवाद दो — तुम्हारे जीवन में उनका बहुत बड़ा योगदान है, बहुत बड़ा उपकार है। हृदय से उनका धन्यवाद करो।

अब हृदय से उनसे क्षमा माँग लो — कुछ बातें जो तुम उनसे कह नहीं पाए, कुछ ग़लतियाँ जो तुमने जान-बूझकर कीं, कुछ ग़लतियाँ या अपराध जो अनजाने में हुए — गुज़र चुके उन पूर्वजों से क्षमा माँग लो। तुम उन्हें समय नहीं दे पाए, अपने जीवन में, अपने कौशल के विकास में, अपने परिवार में व्यस्त रहे — अपने माता-पिता को, अपने दादा-दादी, नाना-नानी को समय नहीं दे पाए। उन्हें तुम्हारा प्रेम और समय चाहिए था — क्षमा माँग लो, वे बहुत करुणावान हैं, वे क्षमा कर देंगे। और जो कुछ भी तुमने अपने हृदय में मलाल रखा है, उसे भी क्षमा कर दो — तुम भी क्षमा कर दो।

और आदि गुरु शिव तथा माँ आदि शक्ति से प्रार्थना करो कि वे तुम्हें पिछले सभी बंधनों से मुक्त कर दें, ताकि तुम इस वर्तमान को पूरी निष्ठा से, पूरी चेतना से, पूरी जागरूकता के साथ जी सको।

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः

अब अपनी आँखें खोल लो।

प्रेम व आशीर्वाद
गुरुदेव श्री अनीश
श्री अनीश हस्ताक्षर

इस सत्संग का पूरा वीडियो देखें

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