ध्यान अवस्था — निर्विचार या जाग्रत? | गुरुदेव श्री अनीश
Share

सत्संग से — साधो ब्लॉग

ध्यान अवस्था —
निर्विचार या जाग्रत?

निर्विचार हो जाना समाधि है, ध्यान नहीं। ध्यान वह जाग्रत अवस्था है, जहाँ तुम किनारे बैठे द्रष्टा की तरह हर विचार को आते-जाते देखते हो।

10 min read गुरुदेव श्री अनीश सत्संग प्रश्नोत्तर
गुरुदेव श्री अनीश सत्संग में

प्रश्न

श्वास ही गुरु है, और श्वास पर ध्यान केंद्रित करके निर्विचार अवस्था में प्रवेश करना ही सच्चा ध्यान है। क्या यह वचन सत्य है?

गुरुदेव श्री अनीश

तुम्हारी बात में कुछ सत्य है, कुछ सत्य नहीं। श्वास ही गुरु है — बहुत सुंदर बात है, क्योंकि सदियों से, शिवकाल से, जब शिव ने माँ आदि शक्ति को विधियाँ दीं, तो विधियों का जो पहला समूह था — विज्ञान भैरव तंत्र के रूप में — वह सब श्वास पर ही आधारित था। तो श्वास गुरु है। गुरु नानक देव जी ने भी इस पर कहा कि "पवन गुरु पानी पिता", यानी पवन यानी हवा यानी श्वास — श्वास को प्राण कहकर गुरु का दर्जा दे दिया। तो श्वास गुरु है। यह एक-एक मनका पिरोकर बनी माला भी है, क्योंकि यह एक माला की तरह अटूट चलती रहती है। उसके अटूट चलने से ही जीवन चलता है। तो तुम्हारी बात यहाँ तक सही है — श्वास गुरु है। श्वास, गुरु होने के साथ-साथ भीतर प्रवेश करने का मार्ग भी है। यहाँ तक भी ठीक है।

निर्विचार — समाधि है, ध्यान नहीं

तो क्या ध्यान में श्वास की माला को जपकर निर्विचार अवस्था में प्रवेश करना ही सच्चा ध्यान है? अब यहाँ थोड़ी बात समझने की आवश्यकता है। यहीं कहीं ग़लती पकड़ में आती है — निर्विचार अवस्था को लेकर इस समझ में कुछ त्रुटि है, कुछ गड़बड़ है। निर्विचार की अवस्था सिर्फ़ समाधि में ही आती है, जब तुम समाधि में प्रवेश करते हो। पतंजलि के योगसूत्र में धारणा, ध्यान, समाधि — इनमें आख़िरी अवस्था समाधि की बताई गई है।

समाधि में तुम जाकर वापस आ सकते हो, पर समाधि में तुम स्थित नहीं रह सकते। समाधि वह अवस्था है जब तुम निर्विचार हो जाते हो — कोई विचार नहीं, सब शून्य, सब ख़त्म हो गया। तुम हो भी या नहीं, इसका भी तुम्हें कोई आभास नहीं — शून्य अवस्था होती है। लेकिन तुम वहाँ सदा नहीं रह सकते। हाँ, तुम ध्यान में सदा रह सकते हो। तो ध्यान निर्विचार अवस्था नहीं है — ध्यान जाग्रत अवस्था है।

ध्यान निर्विचार अवस्था नहीं है — ध्यान जाग्रत अवस्था है।

किनारे बैठा द्रष्टा

जब तुम पूर्णतः जाग गए, और जागकर अपनी हर अवस्था को देख पा रहे हो, अपने हर विचार को देख पा रहे हो — तुम किसी विचार की नाव पर बैठकर कहीं चल नहीं पड़े, तुम विचारों की नावों को अपने हृदय की नदी पर आते-जाते देख रहे हो। तुम किनारे बैठे हो, कहीं पीछे बैठकर इन सभी विचारों को आते-जाते देख रहे हो। तुम किसी विचार से बंध नहीं रहे, किसी विचार को अपना नहीं मान रहे, ठुकरा भी नहीं रहे, किसी विचार को वर्गीकृत अथवा श्रेणीबद्ध नहीं कर रहे — "यह सही है, यह ग़लत है, यह आया, यह गया" — ऐसा नहीं। तुम सड़क किनारे बैठे हो और यातायात चल रहा है, तुम सिर्फ़ द्रष्टा हो। यह ध्यान है — ध्यान की अवस्था, द्रष्टा की अवस्था है।

तुम कहीं पीछे बैठकर यह सारा नाटक देख रहे हो — बाहरी नाटक इस जगत का, भीतरी नाटक इन आते-जाते विचारों का, और गहरा नाटक इन भावों का। तुम अपने भावों को भी देख रहे हो — यह गुस्सा आया, यह प्रेम आया, यह करुणा आई। और उन भावों में से जिस भाव पर तुम कार्य करना चाहते हो, उसे पकड़ते हो, उस पर कार्य करते हो, फिर लौट आते हो — लेकिन तुम ध्यान में स्थित रहते हो।

तुम सड़क किनारे बैठे हो और यातायात चल रहा है, तुम सिर्फ़ द्रष्टा हो।

चाय के दो घूँट

तो कहने का भाव यह है कि ध्यान की अवस्था में विचार हैं, लेकिन तुम उन विचारों के प्रति जाग गए हो, जिनके प्रति आज तक नहीं जागे थे। आज तुम बैठते हो, चाय पीते हो — मैं देखता हूँ लोगों को, कुछ खा रहे हैं, बात कर रहे हैं। यह भी बड़ी अद्भुत बात है — कुछ मित्र सत्संग में मिलने आते हैं, मैंने सत्संग में कोई ऐसी बात कह दी जो किसी के भीतर कहीं प्रवेश कर गई, तो वह व्यक्ति वहीं खो गया। उसकी आँखें एकदम ऐसी हो जाती हैं जैसे वह खो गया हो। वह कहाँ गया, उसे भी पता नहीं — वह किन्हीं विचारों के साथ निकल गया। अब सत्संग में क्या हो रहा है, गुरु क्या बोल रहे हैं, उसे कुछ पता नहीं।

तुम सबके साथ ऐसा ही होता है — तुम बैठे चाय पी रहे हो, खाना खा रहे हो, लेकिन कहीं और ही खो गए। तुम्हें चाय के एक-दो घूँट याद होंगे, खाने का एक-दो निवाला याद होगा, उसका स्वाद कैसा था। मगर एक-दो निवाले के बाद तुम विचारों की दुनिया में गुम हो गए, यानी तुम उन विचारों से जुड़ गए — द्रष्टा चला गया। वह ध्यान एक-दो सेकंड के लिए आया था, फिर तिरोहित हो गया। तो हमारी साधना ऐसे ध्यान में प्रवेश करने की है जो निर्विचार नहीं, जाग्रत है — क्योंकि जीवन को चलाने के लिए विचारों की आवश्यकता है।

जाग्रत विचार — बुद्ध और नानक

तुम्हें लगता है, बुद्ध जब बुद्धत्व को प्राप्त हो गए, नानक जब नानक बन गए, तो उनके विचार ख़त्म हो गए, वे शून्य में चले गए? शून्य की अवस्था से कैसे बात करोगे तुम? कोई तुम्हारा शिष्य आकर पूछ रहा है कि "इस परिस्थिति में क्या करूँ", तुम उसे क्या जवाब दोगे? कोई संत किसी धर्मग्रंथ, शास्त्र की, राम या कृष्ण, राधा या हनुमान की किसी कहानी का ज़िक्र तुमसे करता है — यह कहाँ से आ रहा है? विचार से आ रहा है। वे विचार अब उनके नियंत्रण में आ गए हैं।

नानक जब गा रहे हैं, ईश्वर की याद में स्तुति कर रहे हैं, वाणी आ रही है; बुद्ध के प्रवचन आ रहे हैं — विचार से ही आ रहे हैं, पर एक तार शून्य के साथ जुड़ा है। विचारों का एक प्रवाह चलता है, और बुद्ध पीछे बैठकर इस तार को भी देखते हैं, इन विचारों के प्रवाह को भी देखते हैं। और उनमें से जो विचार उस उपदेश के लिए ज़रूरी हैं, उनका इस्तेमाल करके उन्हें वाणी में बदलते हैं, अपने वाक्य बनाते हैं, और फिर उसे तुम्हारे साथ साझा करते हैं। किसी तल पर विचार चालू रहता है — यह समझने का विषय है।

अभी मैं तुमसे बात कर रहा हूँ, तो एक तार पीछे शून्य से जुड़ा है। वह शून्य आता है और एक विचार का आकार लेता है — यह जाग्रत विचार हो गया। अब यह सुप्त विचार नहीं है, यह जाग्रत विचार है, क्योंकि यह शून्य से आया। जब मैं उस शून्य को पकड़कर उससे एक विचार उत्पन्न करता हूँ — जो तुम्हारे प्रश्न, तुम्हारी अवस्था, तुम्हारी साधना के लिए आवश्यक है — तो मैं उस विचार को वाणी में बाँधकर तुम तक पहुँचा देता हूँ, और ऊर्जा के माध्यम से भी कुछ ऊर्जा तुम तक पहुँचा देता हूँ। तुम अब इस बात को ग्रहण कर रहे हो। तो विचार का एक कार्य है, विचार का उपयोग हुआ।

कोई कहानी याद आ गई तुमसे बात करते-करते, कोई हनुमान जी का क़िस्सा याद आ गया — याद आ गया यानी उस बात का विचार आ गया। कोई व्यक्ति मिला, मुझे उसका कुछ स्मरण आ गया — यानी विचार आ गया, तो मैंने तुमसे वह बात कर ली जो इस संदर्भ में उपयोगी है। क्या तुम समझ रहे हो? तो विचार-शून्य थोड़े ही हो तुम — ध्यान विचार-शून्य नहीं है, ध्यान जाग्रत अवस्था है।

फिर संत इस जाग्रत अवस्था में से किन्हीं क्षणों में समाधि में प्रवेश कर जाते हैं, कुछ समय के लिए उस विचार-शून्य अवस्था में चले जाते हैं। उस समय उन्हें शरीर का कोई आभास नहीं रहता। फिर कुछ समय बाद समाधि से लौटकर पुनः ध्यान अवस्था में स्थित हो जाते हैं, क्योंकि समाधि में रहकर जीवन नहीं चल सकता, शरीर नहीं चल पाएगा। निर्विचार अवस्था समाधि के कुछ पलों के लिए ठीक है। यदि कोई संत समाधि यानी निर्विचार अवस्था में स्थायी रूप से, पूर्णतः स्थित हो जाए, तो शरीर टुकड़े-टुकड़े होने लगता है, उन्हें प्राण त्यागने पड़ते हैं। यह फिर अलग विषय है, उसमें नहीं जाएँगे। अभी तुम्हारा विषय है — ध्यान को समझना।

द्रष्टा को बलवान करने की विधि

फिर से — ध्यान द्रष्टा को जाग्रत करके उसमें रमने की अवस्था है। हर विचार को आते-जाते तुम जाग्रत होकर देख रहे हो, उसमें ख़ुद को संलग्न नहीं कर रहे। जिस विचार का तुम्हारे जीवन में, तुम्हारी साधना में कोई उपयोग है, तुम बस उसी विचार को पकड़कर उस पर कोई कृत्य करते हो। सारे दिन तुम्हें दस हज़ार विचार आते हैं, सबके साथ तुम नहीं निकलते — उनमें से दो-चार-पाँच जो उस परिस्थिति में आवश्यक हैं, तुम बस उन्हीं को ग्रहण करके उन पर कोई कृत्य करते हो, और इस पूरी प्रक्रिया के प्रति जाग्रत रहते हो, इसे द्रष्टा की तरह देखते हो। यहीं से साधना की विधि आरम्भ होती है — यह द्रष्टा को ही बलवान करने की प्रक्रिया है।

मानो तुम आदि शक्ति देवी का स्वरूप हो, और शिव विज्ञान भैरव तंत्र में तुमसे कह रहे हैं —

"हे देवी, आँखें बंद करो, इस श्वास की लय को देखते रहो। यह श्वास अंदर गई — नाक में ठंडक लगी; भीतर गई, कंठ में ठंडक महसूस हुई; फेफड़ों तक गई, फिर नाभि तक गई। देवी, देखते रहो, द्रष्टा बनकर इस श्वास की गति को नाभि तक देखते रहो। फिर यह श्वास नाभि से पलटती है — वहाँ एक छोटा-सा विश्राम है, एक छोटा-सा शून्य है, जहाँ श्वास नहीं चल रही। श्वास पलटी, फिर ऊपर उठी, उसी रास्ते से आकर नाक के रास्ते बाहर चली गई। तुम बस इस श्वास को देख रहे हो।"

यहीं से ध्यान का आरम्भ हुआ। यानी ध्यान का आरम्भ भी द्रष्टा से होता है, और ध्यान का अंत भी द्रष्टा पर है।

दो सेकंड से तुरीया तक

शुरू में तुम इस द्रष्टा को दो-चार सेकंड ही बनाए रख पाओगे, फिर यह समय बढ़ेगा — तुम्हारा द्रष्टा जाग्रत रहेगा कुछ मिनटों तक, कुछ घंटों तक, फिर पूरा दिन। और फिर मज़े की बात यह घटेगी कि निद्रा में भी द्रष्टा जाग्रत रहेगा — तुम नींद में भी जागे रहोगे; शरीर नींद लेगा, द्रष्टा जागकर उस नींद को देखता रहेगा। तुम तुरीया अवस्था को भी पकड़ पाओगे — जिसे चौथी अवस्था कहते हैं — यह जाग्रत होने की अवस्था है। तो ध्यान की सारी प्रक्रिया, रोज़, जाग्रत होने की प्रक्रिया है। विचार-शून्य के झंझट में मत पड़ना, वह ध्यान का ग़लत रास्ता है — उस झंझट को मापदंड मत बनाना।

ध्यान में ज़्यादा विचार क्यों आते हैं?

कई मित्र आकर बोलते हैं कि ध्यान में विचार ज़्यादा आते हैं — यह बात तुम्हारे काम आएगी, ध्यान से सुनना। शायद तुम लोगों का भी यही अनुभव है कि सारे दिन उतने विचार नहीं आते, पर आँखें बंद करके मौन में बैठे, ध्यान की अवस्था की ओर जाने लगे, तो ज़्यादा विचार आने लगे। असल में ज़्यादा विचार नहीं आ रहे — द्रष्टा जाग रहा है, अब द्रष्टा सभी विचारों को देख पा रहा है। विचारों की इतनी बाढ़ हमेशा रही है; तुम्हारी सड़क पर सदा से, पूरे दिन, इतना यातायात रहता है। लेकिन तुम अपने कर्मों में खोए होते हो, तुम्हारा द्रष्टा सोया रहता है, इसलिए तुम्हें पता नहीं होता कि विचारों का इतना यातायात चल रहा है।

असल में ज़्यादा विचार नहीं आ रहे — द्रष्टा जाग रहा है, अब द्रष्टा सभी विचारों को देख पा रहा है।

ध्यान में बैठते ही तुम्हें एहसास होने लगता है, तुम देखने लगते हो — "अरे, विचारों का इतना यातायात!" तो तुम्हारी बुद्धि ग़लत समझाती है कि ध्यान में ज़्यादा विचार आते हैं — यह ग़लत वचन है। बुद्धि के कथन की थोड़ी जाँच-पड़ताल किया करो। बहुत ठगिनी है बुद्धि — वह तुम्हें बार-बार ठगती है और ग़लत परिभाषाएँ देती है कि "ध्यान में ज़्यादा विचार आ रहे हैं, छोड़ो इसे, यह तो झंझट है।"

जबकि सच यह है कि ध्यान में तुम्हें ज़्यादा विचार दिख रहे हैं, क्योंकि ज़्यादा विचार तो थे ही — ध्यान में तुम जाग रहे हो और विचारों को, मन की सभी अवस्थाओं को देख पा रहे हो। अगले चरण में, जब ध्यान गहरा होगा, तो इन विचारों से अलग होना भी तुम सीख लोगे। आज ये दस हज़ार विचार तुम्हें डरा रहे हैं, तनाव दे रहे हैं, क्योंकि तुम इनके ऊपर सवार होकर चलने का प्रयास करते हो — तुम द्रष्टा को भूल जाते हो, विचार की लय में निकल पड़ते हो। कोई विचार तुम्हें ले उड़ता है, फिर हर विचार तुम्हें उड़ाकर कहीं और ले जाता है।

ध्यान — जीवन की भूमि

तो ध्यान तुम्हें तुम्हारी भूमि देता है — यह अत्यंत आवश्यक है। कोई पौधा वृक्ष नहीं बन पाएगा अगर उसे सही भूमि नहीं मिलेगी। ध्यान तुम्हारे जीवन को भूमि देता है, ताकि इस भूमि में, इस द्रष्टा में स्थित होकर तुम सारे जीवन के प्रपंच को देख पाओ और उसमें उलझो मत, उससे बंधो मत, उसके मोह से मत बंधो — इस पल में पूरी तरह उपस्थित रहो। यही ध्यान की प्रक्रिया है।

आशा करता हूँ कि तुम आज से ध्यान के सही स्वरूप को जान पाओगे, समझ पाओगे, अनुभव कर पाओगे, और उसमें गहरे प्रवेश कर पाओगे।

ॐ नमः शिवाय

प्रेम व आशीर्वाद
गुरुदेव श्री अनीश
श्री अनीश हस्ताक्षर

इस सत्संग का पूरा वीडियो देखें

YouTube — साधो | गुरुदेव श्री अनीश

प्रत्येक रविवार — गुरुदेव के साथ
लाइव सत्संग में सम्मिलित हों

8:00 AM IST · Online · Worldwide
साधना, ध्यान, और जीवन के गहरे प्रश्नों पर गुरुदेव का मार्गदर्शन

Saadho
साधो संघ फाउंडेशन · धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश · connect@saadho.org
© 2026 साधो संघ फाउंडेशन · सर्वाधिकार सुरक्षित
लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु

Related Articles

"Knowing ourselves is the beginning of creating a joyful life".

महालय अमावस्या यज्ञ में गुरुदेव श्री अनीश

Published Article

पितृ पक्ष और महालय अमावस्या — पूर्वजों से आशीर्वाद व क्षमा-याचना
पितृ पक्ष और महालय अमावस्या का साधना में क्या महत्व है? गुरुदेव श्री अनीश बताते हैं कि पूर्वजों के ऋण से मुक्ति धन्यवाद, क्षमा-याचना और क्षमा से कैसे होती है।

Share To

ध्यान निर्विचार अवस्था — आश्रम में सत्संग के दौरान माइक पर बोलते गुरुदेव श्री अनीश

Published Article

क्या ध्यान निर्विचार अवस्था है? — गुरुदेव श्री अनीश
क्या निर्विचार हो जाना ही ध्यान है? गुरुदेव श्री अनीश समझाते हैं कि निर्विचार अवस्था समाधि है, ध्यान नहीं — ध्यान द्रष्टा की जाग्रत अवस्था है। जानिए ध्यान और समाधि का अंतर।

Share To

man-ki-chanchalata

Published Article

चंचल मन को स्थिर कैसे करें? — गुरुदेव श्री अनीश
मन बंदर की भाँति चंचल है — कभी एक विचार पर नहीं ठहरता। गुरुदेव श्री अनीश बताते हैं कि मन को स्थिर करने के लिए अपने स्वभाव के अनुसार यम-नियम अपनाएँ। मन को बांधना बंधन नहीं, साधना की नींव है।

Share To

Subscribe to our YouTube Channel

Copyright 2026 Saadho Sangha Foundation. All rights reserved. | Terms and Conditions | Refund Policy | Cancellation Policy | Copyrights | Privacy Policy

Scroll to Top