मन की चंचलता एवं उसको स्थिर करने के उपाय — गुरुदेव श्री अनीश

सत्संग से — साधो ब्लॉग

मन की चंचलता
एवं उसको स्थिर करने के उपाय

मन का स्वभाव एक बंदर की भाँति हर क्षण उछल-कूद करने का है। जब तक इसे शिक्षित नहीं करेंगे, तब तक साधना में गहराई नहीं आ सकती।

8 min read गुरुदेव श्री अनीश सत्संग प्रवचन
गुरुदेव श्री अनीश — सत्संग प्रवचन
गुरुदेव श्री अनीश — साधना मार्ग पर साधकों का मार्गदर्शन

मन का स्वभाव एक बंदर की भाँति हर क्षण उछल-कूद करने का है। जैसे बंदर कब किस डाल से किस डाल पर छलाँग लगाएगा, कोई नहीं जानता। वह कभी भी एक डाल पर टिक नहीं सकता है, क्योंकि यह बंदर का गुण है। ठीक उसी तरह मन कभी भी एक विचार पर ठहर नहीं सकता, क्योंकि यह वही बंदर है जो हर समय नित नूतन वृक्ष और नई-नई डालियाँ चुनता रहता है।

अगर हमें साधना के पथ पर चलना है या गृहस्थी के कार्य को सफलतापूर्वक निभाना है, तो हमें मन को स्थिर रहना सिखाना ही होगा। क्योंकि मन आपका है, तो आप ही मन के स्वामी हैं, और मन आपका बंदर है। हमें ही उस पालतू बंदर को शिक्षित करना होगा। अतः मन जब तक शांत नहीं होगा, तब तक हम साधना के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकते हैं। हमें सबसे पहले मन को नियंत्रित करना ही होगा। और मन को बैठना सिखाने के लिए कुछ नियम जीवन में अपनाने होंगे, जिनके माध्यम से इस बेकाबू मन को स्थिर कर उसे सही मार्ग पर लाया जा सके।

मन के जाल

हर चीज़ का अपना एक खास गुण होता है। जैसे जल का गुण है सदा नीचे की तरफ बहना, अग्नि का गुण है ऊपर की ओर बहना। उसी तरह मन का गुण है चंचलता, वह हर क्षण भ्रमित करता है। वह अपनी आदत के अनुसार अपना नित्य नूतन जाल बुनता रहता है।

कभी तो मन इतना अस्त-व्यस्त होता है कि अगर हम साधना के लिए बैठते हैं, तो वह अपने स्वभाव अनुसार हमारा ध्यान गृहस्थ जीवन के कार्यों की तरफ ले जाएगा और कार्यों की एक लंबी-चौड़ी सूची पकड़ा देगा — कि अभी यह कार्य करना है, वह कार्य करना है। और जब हम कार्य में व्यस्त होना चाहते हैं, तो वह हमें साधना के लिए प्रेरित करेगा; मन में विचार आएँगे कि आज तो मैंने साधना नहीं की, साधना भी बहुत जरूरी है। यानी जब भी आप किसी कार्य के लिए बैठेंगे, तो वह अपने कार्यों की सूची तैयार करना शुरू कर देगा।

मन रूपी बंदर के गले में रस्सी है, और वह रस्सी आपके हाथ में है। तो जहाँ-जहाँ वह बंदर जाएगा, उसके पीछे-पीछे आपको भी भागना पड़ेगा।

क्या मन गलत है? क्या करें इस मन का? इसे मार तो सकते नहीं, और न ही मन को दबाया जा सकता है, क्योंकि वह है तो अपना ही, आप ही उसके स्वामी हो, वह आपके साथ ही चल रहा है। तो जब तक इसे बांधेंगे नहीं, तब तक वह आपको बैठने नहीं देगा। मन उपद्रव मचाता रहेगा, जो उसका स्वभाव है। कहने का भाव यह है कि मन रूपी बंदर के गले में रस्सी है, और वह रस्सी आपके हाथ में है। तो जहाँ-जहाँ वह बंदर जाएगा, उसके पीछे-पीछे आपको भी भागना पड़ेगा। तो क्यों न आप उस बंदर को एक जगह खड़ा रहना सिखाएँ, जिससे कि न उसे भागना पड़े और न ही आपको। और आप किसी पेड़ की छाँव में शांति से बैठकर शीतल पवन का आनंद ले पाओगे और अपनी साधना में लीन हो पाओगे। और यह तभी संभव है जब आप उस बंदर को शिक्षित करेंगे।

मन की स्वतंत्रता

मन हमेशा स्वतंत्र रहना चाहता है। वह स्वभाव अनुसार अपनी स्वतंत्रता के मायने गढ़ता है, जैसे कि "मैं स्वतंत्र हूँ, आज अपनी मर्जी से सोऊँगा, अपनी इच्छा से खाऊँगा, अपनी मनमर्जी करूँगा, आज मेरा ऐसा भाव है" इत्यादि। लेकिन यह स्वतंत्रता नहीं है। यह अशांत मन का खेल है, वह अपने ऊपर एक आवरण डाल लेता है।

साधना में मन बड़ा चालाक है, इसके पास हज़ार तरह के आवरण होते हैं। कभी यह स्वतंत्रता का आवरण डाल लेता है, और स्वतंत्रता की आड़ में आपको छल लेता है कि मुझे नहीं बंधना है, और आप भटक जाते हैं।

स्वतंत्रता का सही मायनों में अर्थ होता है — स्व का तंत्र — यानी कि स्वेच्छा से अपने तन और मन को संगठित कर सकते हो, आप स्वेच्छा से अपने भीतर कुछ भी नियंत्रित कर सकते हो।

आप अपनी दिनचर्या बना सकते हो और उसमें तल्लीन हो सकते हो, और प्रण ले सकते हो कि क्या करना है, क्या नहीं करना है। और यह तभी संभव है जब आपका मन और तन एक-दूसरे से तादात्म्य बना लेते हैं। तन और मन एक लय में आ जाते हैं, वे विपरीत दिशा में भागना बंद कर देते हैं। यानी मन को बांधना नहीं है, बल्कि उसे नियंत्रित करना है।

जिस क्षण यह मन वश में हो गया, उसी क्षण से आप हर कार्य या विचार को सही वक्त और सही दिशा में लगा सकते हो। अगर मन सध गया तो हर पल साधना का होगा — परिवार के साथ होगा, किसी कार्य में होगा, साधना में होगा, जहाँ भी होगा, साधना का पल होगा। गुरु-संगत में होगा तो साधना का पल होगा। बात सारी मन को केंद्रित करने की है। नियंत्रण बंधन नहीं होता।

यम और नियम की आवश्यकता

जीवन में यम एवं नियम बहुत ही आवश्यक हैं, क्योंकि बिना नियम के हम मन को नियंत्रित नहीं कर सकते। और जब तक मन नियंत्रित नहीं होगा, कुछ भी संतुलित नहीं हो सकता, क्योंकि जीवन में संतुलन बनाना बहुत ही जरूरी है। लेकिन नियम कोई बंधन नहीं है, और न ही आपकी स्वतंत्रता पर इसका कोई विपरीत प्रभाव पड़ता है।

साथ ही इस बात का भी ख्याल रखना है कि आजीवन नियम में कैद भी नहीं रहना है, क्योंकि नियम का उद्देश्य है — मन को केंद्रित करना, तन और मन में समन्वय ला देना। जब यह स्थिति बन जाए, तो आप नियम को छोड़ सकते हो। कहने का मतलब है कि जब कोई गौतम बुद्ध हो जाता है, तब उसे किसी नियम में बँधने की जरूरत नहीं रहती, और नियम को छोड़ा जा सकता है — उसके पहले नहीं।

नियम भी अपने स्वभाव के अनुसार ही चुना जाता है। स्वभाव का अर्थ है आपकी आंतरिक व्यवस्था; वह आंतरिक व्यवस्था ही है जिसे हम स्वभाव कहते हैं। संसार में प्रचलित किसी भी नियम को अपनाने से पहले अपने स्वभाव से मेल खाने वाले नियम को ही चुनना चाहिए। जब आप अपने स्वभाव के अनुसार किसी नियम या साधना को चुनते हैं, तो वह आपको बोझ नहीं लगेगी, वह नियम आपको आनंद देगा, और आप उससे प्रेम करने लगेंगे।

इसके लिए आप किसी गुरु या योग्य व्यक्ति से सहयोग ले सकते हो, मगर अपने स्वभाव के अनुसार ही नियम चुनना और उसे अमल में लाना आपके लिए अनिवार्य है। क्योंकि जब भी कोई नियम या प्रक्रिया यूँ ही अपना ली जाती है, जो आपके स्वभाव के अनुसार नहीं है, तो वह आपको एक बोझ ही लगेगी। आप उससे दूर भागना चाहेंगे, वह आपकी साधना में गति नहीं देगी, क्योंकि हर व्यक्ति का स्वभाव अलग-अलग होता है। इसलिए अपने स्वभाव से मेल खाती प्रक्रिया ही अपनाने का प्रयास करें, जो उचित और अनिवार्य भी है।

भगवान शिव ने हमें 112 विधियाँ दी हैं — एक विधि भी दी जा सकती थी, फिर इतनी सारी देने की क्या जरूरत थी? क्योंकि हर व्यक्ति का स्वभाव अलग-अलग है।

यही बात भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता में बताई है — कि हे अर्जुन, विचार कर कि तेरा स्वभाव क्या है, उसे पहचान, और जो तेरा स्वभाव है उसके अनुसार अपना धर्म चुन। तू एक क्षत्रिय है, और तेरा काम एक योद्धा का है; तू उठ और युद्ध कर, अपने क्षत्रिय स्वभाव का पालन कर। और यही हर मनुष्य के लिए उपयुक्त भी है। इसलिए खुद के स्वभाव के अनुसार मार्ग चुनो और खुद को शिक्षित करो।

जीवन में स्वभाव की बड़ी अहम भूमिका होती है। अतः पहली बात यह है कि स्वभाव के अनुसार चुना हुआ नियम या साधना कभी भी बोझ नहीं बनेगा। दूसरी बात यह कि आपको इसे छोड़ने की इच्छा कभी नहीं होगी। तीसरी बात, यह आपकी साधना को फलीभूत करेगा।

कुछ लोगों को जंगलों या पहाड़ों में घूमना अच्छा लगता है। कुछ लोगों को समुद्र तट पर घूमना अच्छा लगता है। कुछ लोगों को पेड़ पसंद होते हैं। कुछ लोगों को मरुस्थल का दृश्य अच्छा लगता है। यह सब सिर्फ स्वभाव है। आप जो कहते हैं, "मुझे यह पसंद है," "मुझे वह पसंद नहीं है" — यह सिर्फ आपके स्वभाव का एक संकेत है। आपके स्वभाव के अनुसार की गई कोई भी आध्यात्मिक साधना बंधन नहीं होगी।

निष्कर्ष

इसलिए, मैंने सूत्र के रूप में दो-तीन बातें बताई हैं। मैं उन्हें आपके लिए दोहराता हूँ ताकि आप उन्हें समझ सकें। पहला, मन को बांधना आवश्यक है — हर प्रक्रिया मन को बांधने की प्रक्रिया है, यह आपको बांधने की प्रक्रिया नहीं है। और मन को बांधे बिना आप किसी भी आध्यात्मिक साधना में, किसी गहरे सत्य में प्रवेश नहीं कर सकते।

और अपने स्वभाव के अनुसार जब कोई साधना या नियम अपनाया जाता है, तो वह फलित होता है। नियम ही हमें आगे बढ़ाएंगे; स्वतंत्रता का अर्थ नियम-मुक्त होना नहीं है, बल्कि नियम का सदुपयोग करके अपने तन और मन में तादात्म्य लाना ही स्वतंत्रता का मूल उद्देश्य है। जब मन और तन एक लय में आ जाएँगे, जीवन में साधना सफल होने लगेगी।

प्रेम व आशीर्वाद
गुरुदेव श्री अनीश
श्री अनीश हस्ताक्षर

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Saadho
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